लोग कार्ल मार्क्स का बस यही *अफीम वाला वाक्य* ले उड़े है.
कार्ल मार्क्स ने *धर्म* के बारे में लिखा है:
कार्ल मार्क्स ने *धर्म* के बारे में लिखा है:
*"धर्म मनुष्य की वेदना और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है. धर्म मनुष्य को भ्रमात्मक सुख देता है, वास्तविक सुख नहीं, जो सामाजिक परिवर्तन से आता है. इसलिए वे परिस्तिथियाँ बदलना जरुरी है जिनमे मनुष्य भ्रमात्मक सुख में भूला रहता है.
धर्म इसलिए जनता के लिए अफीम है.''*
धर्म इसलिए जनता के लिए अफीम है.''*
अब आप देखिये:
घर में खाने को नहीं है, तनखा कम, महंगाई बहुत, शोषण अलग, मगर 2-3 घंटे कीर्तन, भजन, धर्मकथा सुनकर सुखी है. यह *भ्रमात्मक सुख* है.
*वास्तविक सुख, जीवन की हालत में सुधार से आता है जिसके लिए "संघर्ष करना" चाहिए.*
घर में खाने को नहीं है, तनखा कम, महंगाई बहुत, शोषण अलग, मगर 2-3 घंटे कीर्तन, भजन, धर्मकथा सुनकर सुखी है. यह *भ्रमात्मक सुख* है.
*वास्तविक सुख, जीवन की हालत में सुधार से आता है जिसके लिए "संघर्ष करना" चाहिए.*
शोषक वर्ग, आदमी को धर्म के भ्रमपूर्ण सुख में उलझाये रखता है, ताकि वह वास्तविक सुख के लिए संघर्ष न करे. अन्यथा शोषकों के हितों की हानि होती है.
आप देखते है सारे धार्मिक अनुष्ठान मुनाफाखोर, कालाबाजारी, जमाखोर, शोषक कराते है.
*ये आम आदमी को निष्क्रिय और मूर्ख बनाते है.*
*ये आम आदमी को निष्क्रिय और मूर्ख बनाते है.*
--- *हरिशंकर परसाई*