Monday, 24 October 2016

चुनाव में धर्म के इस्तेमाल की इज़ाज़त नहीं: सुप्रीम कोर्ट

21 ओक्टूबर, 2016 को यह आदेश हुआ! अच्छी बात है!
वैसे जरुरत धर्म निरपेक्ष समाज की नहीं बल्कि धर्म विहीन समाज की है! धर्म वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण से स्तित्वहीन हो चूका है! नास्तिक भगत सिंह को कैसे भूल सकते हैं?
धर्म के ठेकेदार इसे जीवित रखने की हर प्रयास करते हैं! एक तो इन्हें अपने पूंजीपति मालिकों से कमीशन मिलता है जनता के क्रांतिकारी लौ को बुझाने की लिए, और दुसरे इन्हें सत्ता में सीधे या पीछे से भागीदारी मिलाती है! कमाई का एक छोटा हिस्सा यह गुंडों को देते हैं, जो बेरोजगार होते हैं और सड़क पर हफ्ता वसूल करते हैं! उनका काम प्रगतिशील और क्रांतिकारी लोगों को तंग करना और मारना होता है!
पूंजीपति अपने मिडिया को आदेश देते हैं की इनकी खबर को प्रमुखता दें! देखा होगा दो कौड़ी के ऐसे पार्टी के प्रवक्ता बनकर टीवी पर बहस करते हुए!
समाज को बदलना है तो इस व्यवस्था के अन्दर से नहीं होगा! इस प्रजातंत्र के सभी स्तम्भ पूंजीपति की दलाली कर रहे हैं! 500 वर्ष पुराना पूंजीवाद सड़ चूका है, मरानान्सन है! इसे बचने की हर कोशिश बेकार है, बल्कि जनता का कष्ट बढ़ता ही जा रहा है!
सर्वहारा क्रांति ही एकमात्र रास्ता है! समाजवाद ही मानवता का अगला पड़ाव है!

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